गांधी के साथ जेल गए 4 वीर, आज परिवार पेंशन-सम्मान को तरसे, जानें नारागांव के इन गुमनाम नायकों की कहानी
Naragaon Freedom Fighters: देश आजादी का जश्न मना रहा है, लेकिन बालोद के नारागांव में आजादी की लड़ाई लड़ने वाले चार स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार आज भी सम्मान और सरकारी मदद के इंतजार में हैं।
Independence Day 2026: देश आजादी का जश्न मना रहा है, लेकिन बालोद जिले के ग्राम नारागांव में आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाले चार स्वतंत्रता सेनानियों के वारिस आज भी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। इनमें पीतांबर मंडावी, सुकालू राम करियाम, सरजूराम मंडावी और बिसाहू राम गावड़े शामिल हैं। चारों ने 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए जल सत्याग्रह में हिस्सा लिया और 24 दिन जेल की यातनाएं सहीं। अब ग्रामीणों की मांग पर गांव में इनकी प्रतिमाओं वाला स्मृति स्थल बनकर तैयार हो गया है। दूसरी ओर, इन स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों का कहना है कि उन्हें आज तक पेंशन और सम्मान का लाभ नहीं मिला।
पं. सुंदरलाल शर्मा के साथ गांव-गांव में जगाई आजादी की अलख
1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले जल सत्याग्रह में इन चारों स्वतंत्रता सेनानियों ने भाग लिया। अंग्रेजों ने 19 अक्टूबर 1930 को आंदोलन को कुचलने के लिए सभा में भगदड़ मचाई और चारों को गिरफ्तार कर लिया। 24 नवंबर 1930 को रिहा होने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ के गांधी पं. सुंदरलाल शर्मा के साथ मिलकर गांव-गांव जाकर आजादी की अलख जगाई।
शासन से परिवार को नहीं मिली कोई मदद
स्वतंत्रता सेनानी सुकालू राम करियाम के पुत्र लेख सिंह ठाकुर का कहना है कि इन सेनानियों की स्मृतियों को सहेजने के लिए परिवार और ग्रामीण अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से अब तक कोई पहल नहीं हुई है।
गांधी के जल सत्याग्रह में हुए थे शामिल
पीतांबर मंडावी: 1930 के जल सत्याग्रह में अग्रणी भूमिका निभाई। रायपुर में पं. सुंदरलाल शर्मा के साथ आंदोलन में सक्रिय रहे और नारे लगाकर लोगों को आंदोलन से जोड़ने का काम किया।
सुकालू राम करियाम: जल सत्याग्रह में शामिल हुए और 24 दिन जेल में रहे। बाद में गांव-गांव जाकर सत्याग्रह और देशभक्ति का प्रचार किया।
सरजूराम मंडावी: महात्मा गांधी के आंदोलन के सिपाही रहे। जेल से लौटने के बाद नाट्य मंचन के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ जनजागृति फैलाने का काम किया।
बिसाहू राम गावड़े: जल सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तार हुए। अंग्रेजों की यातनाएं झेलने के बावजूद आंदोलन से पीछे नहीं हटे। आजादी के बाद भी सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे।
ग्रामीणों के अनुसार, इन चारों के नारों और आंदोलन के कारण ही गांव का नाम नारागांव पड़ा।
अब स्मृति स्थल पर हर साल होंगे आयोजन
स्मृति स्थल बनने के बाद अब हर साल यहां आयोजन किए जाएंगे। इससे नई पीढ़ी इन स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान को याद कर सकेगी। ग्रामीणों की मांग है कि सरकार इन परिवारों को आर्थिक सहायता और उचित सम्मान दे। उनका कहना है कि स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों का सम्मान ही उनके बलिदान का सच्चा सम्मान होगा।
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